श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 287-288
 
 
श्लोक  13.15.287-288 
उपमन्युरुवाच
नमो देवाधिदेवाय महादेवाय ते नम:॥ २८७॥
शक्ररूपाय शक्राय शक्रवेषधराय च।
नमस्ते वज्रहस्ताय पिङ्गलायारुणाय च॥ २८८॥
 
 
अनुवाद
उपमन्यु ने कहा, "भगवन! आप देवताओं के भी अधिदेव हैं। आपको नमस्कार है। आप सबसे बड़े देवता हैं, आपको नमस्कार है। इन्द्र आपका ही स्वरूप हैं। आप स्वयं इन्द्र हैं और इन्द्र के समान ही वेष धारण करते हैं। इन्द्र के रूप में आप हाथ में वज्र धारण करते हैं। आपका वर्ण लाल और लाल है, आपको नमस्कार है।"
 
Upamanyu said, "Lord! You are the supreme deity of the gods. Salutations to you. You are the greatest god, salutations to you. Indra is your form. You are Indra himself and you wear the same attire as Indra. In the form of Indra, you hold the thunderbolt in your hand. Your colour is red and red, salutations to you. 287-288.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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