श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 285-286h
 
 
श्लोक  13.15.285-286h 
तेषां मध्यगतो देवो रराज भगवान‍् शिव:॥ २८५॥
शरदभ्रविनिर्मुक्त: परिधिस्थ इवांशुमान्।
 
 
अनुवाद
इन तीनों के मध्य में विराजमान भगवान शिव ऐसे शोभायमान हो रहे थे, जैसे शरद ऋतु के बादलों के आवरण से मुक्त होकर वृत्ताकार रूप में स्थित सूर्यदेव।
 
Lord Shiva seated in the midst of these three, was looking as beautiful as the Sun God, freed from the cover of autumn clouds, situated in a circle. 285 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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