श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 276-277
 
 
श्लोक  13.15.276-277 
सव्यदेशे तु देवस्य ब्रह्मा लोकपितामह:।
दिव्यं विमानमास्थाय हंसयुक्तं मनोजवम्॥ २७६॥
वामपार्श्वगतश्चापि तथा नारायण: स्थित:।
वैनतेयं समारुह्य शंखचक्रगदाधर:॥ २७७॥
 
 
अनुवाद
उस समय महादेवजी के दाहिनी ओर लोकपितामह ब्रह्माजी मन के समान वेगवान हंस के साथ दिव्य विमान पर बैठे हुए दिखाई दे रहे थे और बाईं ओर भगवान नारायण शंख, चक्र और गदा धारण किए हुए गरुड़ पर विराजमान थे ॥276-277॥
 
At that time, on the right side of Mahadevji, Lokpitamah Brahma was seen sitting on a divine aircraft with a swan as fast as the mind and on the left side, Lord Narayana was sitting on Garuda holding a conch, disc and mace. 276-277॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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