श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 274
 
 
श्लोक  13.15.274 
दीप्तधार: सुरौद्रास्य: सर्पकण्ठाग्रधिष्ठित:।
अभवच्छूलिनोऽभ्याशे दीप्तवह्निशतोपम:॥ २७४॥
 
 
अनुवाद
उसका फल चमक रहा था और उसका मुख अत्यन्त भयानक लग रहा था। वह सर्प के समान गर्दन वाले महादेवजी के गले के अग्रभाग में स्थित था। इस प्रकार भालाधारी भगवान शिव के समीप वह फरसा सैकड़ों प्रज्वलित अग्नियों के समान चमक रहा था।
 
Its blade was shining and its mouth looked very scary. It was situated at the front of Mahadevji's neck who had a snake-like neck. In this way, near Lord Shiva who held a spear, that axe was shining like hundreds of blazing fires.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)