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श्लोक 13.15.27  |
यदवाप्तं च मे पूर्वं साम्बहेतो: सुदुष्करम्।
यथावद् भगवान् दृष्टो मया पूर्वं समाधिना॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| मैं वह सम्पूर्ण घटना कह रहा हूँ कि किस प्रकार पूर्वकाल में मैंने साम्ब के जन्म के लिए अत्यन्त कठिन तपस्या की थी और दुर्लभ नामसमूह का ज्ञान प्राप्त किया था तथा किस प्रकार ध्यान द्वारा मैंने भगवान् स्वर को उनके वास्तविक रूप में देखा था॥ 27॥ |
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| I am narrating the entire incident of how in the past I had performed extremely arduous penance for the birth of Sāmba and acquired the knowledge of the rare group of names. And how through meditation I had seen Lord Svara in his true form.॥ 27॥ |
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