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mahabharat 13.15.269: उस भाले की नोक अत्यंत तीक्ष्ण है। वह अत्यंत डरावना और रोमांचकारी है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वह अपनी भौंहें तीन स्थानों से टेढ़ी करके अपने प्रतिद्वंद्वी को डाँट रहा हो।   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 269
 
 
श्लोक  13.15.269 
तच्छूलमतितीक्ष्णाग्रं सुभीमं लोमहर्षणम्।
त्रिशिखां भ्रुकुटिं कृत्वा तर्जमानमिव स्थितम्॥ २६९॥
 
 
अनुवाद
उस भाले की नोक अत्यंत तीक्ष्ण है। वह अत्यंत डरावना और रोमांचकारी है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वह अपनी भौंहें तीन स्थानों से टेढ़ी करके अपने प्रतिद्वंद्वी को डाँट रहा हो।
 
The tip of that spear is extremely sharp. It is very scary and thrilling. It seems as if it is scolding its opponent by crooking its eyebrows at three places. 269.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)