श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 267-268
 
 
श्लोक  13.15.267-268 
यौवनाश्वो हतो येन मान्धाता सबल: पुरा।
चक्रवर्ती महातेजास्त्रिलोकविजयी नृप:॥ २६७॥
महाबलो महावीर्य: शक्रतुल्यपराक्रम:।
करस्थेनैव गोविन्द लवणस्येह रक्षस:॥ २६८॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! पूर्वकाल में तीनों लोकों के विजेता, अत्यंत तेजस्वी, अत्यंत पराक्रमी, अत्यंत पराक्रमी और इंद्र के समान पराक्रमी चक्रवर्ती राजा मान्धाता लवणासुर के उसी भाले से सेना सहित नष्ट हो गए थे। वह अस्त्र अभी राक्षस के हाथ से छूटा भी नहीं था कि राजा का पूर्ण विनाश हो गया॥267-268॥
 
Sri Krishna! In the past, the Chakravarti King Mandhaata, who was the conqueror of the three worlds, was extremely radiant, extremely powerful, extremely valiant and as powerful as Indra, was destroyed along with his army by the same spear used by Lavanasur. The weapon had not even left the demon's hand when the king was completely destroyed.॥267-268॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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