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mahabharat 13.15.264-265h: मैंने यहाँ परम उत्तम एवं अद्भुत पाशुपतास्त्र देखा है, जिस अस्त्र से ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता भी अजेय हैं। वह महान् अस्त्र अत्यंत गुप्त है। उसके समान अथवा उससे भी महान् कोई अस्त्र नहीं है। ॥264 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 264-265h
 
 
श्लोक  13.15.264-265h 
नावध्यो यस्य लोकेऽस्मिन् ब्रह्मविष्णुसुरेष्वपि।
तदहं दृष्टवांस्तत्र आश्चर्यमिदमुत्तमम्॥ २६४॥
गुह्यमस्त्रवरं नान्यत् तत्तुल्यमधिकं हि वा।
 
 
अनुवाद
मैंने यहाँ परम उत्तम एवं अद्भुत पाशुपतास्त्र देखा है, जिस अस्त्र से ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता भी अजेय हैं। वह महान् अस्त्र अत्यंत गुप्त है। उसके समान अथवा उससे भी महान् कोई अस्त्र नहीं है। ॥264 1/2॥
 
I have seen here the most excellent and astonishing Pashupatastra, the weapon for which even Brahma, Vishnu and other gods are invincible. That great weapon is extremely secret. There is no other weapon equal to it or even greater than it. ॥264 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)