श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 263
 
 
श्लोक  13.15.263 
निर्दहेत च यत् कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम्।
महेश्वरभुजोत्सृष्टं निमेषार्धान्न संशय:॥ २६३॥
 
 
अनुवाद
भगवान महेश्वर की भुजाओं से छूटने पर वह अस्त्र क्षण मात्र में समस्त चर-अचर प्राणियों सहित सम्पूर्ण त्रिलोकी को नष्ट कर देता है - इसमें संशय नहीं है।।263।।
 
When released from Lord Maheshwar's arms, that weapon destroys the entire Triloki along with all the animate and inanimate creatures in half a moment - there is no doubt about this. 263.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)