| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन » श्लोक 260 |
|
| | | | श्लोक 13.15.260  | एकपादं महादंष्ट्रं सहस्रशिरसोदरम्।
सहस्रभुजजिह्वाक्षमुद्गिरन्तमिवानलम्॥ २६०॥ | | | | | | अनुवाद | | वह भी सर्परूपी प्रकट हुआ । उसके एक पैर, बहुत बड़े-बड़े दाँत, हजारों सिर, हजारों पेट, हजारों भुजाएँ, हजारों जीभें और हजारों नेत्र थे । वह अग्नि उगल रहा था ॥260॥ | | | | He too appeared in the form of a snake. He had one leg, very large teeth, thousands of heads, thousands of stomachs, thousands of arms, thousands of tongues and thousands of eyes. He was spitting fire.॥ 260॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|