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mahabharat 13.15.259: उसके समान कोई दूसरा अस्त्र नहीं था। वह विशाल अस्त्र, जो समस्त प्राणियों को भयभीत कर रहा था, अवर्णनीय प्रतीत हो रहा था और अपने मुख से चिनगारियों के साथ अग्नि की वर्षा कर रहा था।   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 259
 
 
श्लोक  13.15.259 
अद्वितीयमनिर्देश्यं सर्वभूतभयावहम्।
सस्फुलिङ्गं महाकायं विसृजन्तमिवानलम्॥ २५९॥
 
 
अनुवाद
उसके समान कोई दूसरा अस्त्र नहीं था। वह विशाल अस्त्र, जो समस्त प्राणियों को भयभीत कर रहा था, अवर्णनीय प्रतीत हो रहा था और अपने मुख से चिनगारियों के साथ अग्नि की वर्षा कर रहा था।
 
There was no other weapon equal to it. That gigantic weapon, which frightened all creatures, seemed indescribable and was showering fire along with sparks from its mouth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)