श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 258
 
 
श्लोक  13.15.258 
शरश्च सूर्यसंकाश: कालानलसमद्युति:।
एतदस्त्रं महाघोरं दिव्यं पाशुपतं महत्॥ २५८॥
 
 
अनुवाद
भगवान का वह बाण प्रलयकाल के सूर्य और अग्नि के समान अपार चमक से चमकता था। यह सबसे भयानक और महान दिव्य पाशुपत अस्त्र था।
 
The arrow of God used to shine with immense brightness like the sun and the fire of the doomsday. This was the most terrible and great divine Pashupat weapon.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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