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श्लोक 13.15.254  |
अशोभतास्य देवस्य माला गात्रो सितप्रभे।
जातरूपमयै: पद्मैर्ग्रथिता रत्नभूषिता॥ २५४॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान् के उज्ज्वल गौर विग्रह पर स्वर्णकमलों से गुथी हुई रत्नजटित माला बड़ी शोभा दे रही थी ॥254॥ |
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| The jewel-encrusted garland entwined with golden lotuses was giving great beauty on the bright effulgent Gaur Deity of the Lord. 254॥ |
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