श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 249-250
 
 
श्लोक  13.15.249-250 
अथापश्यं स्थितं स्थाणुं भगवन्तं महेश्वरम्॥ २४९॥
नीलकण्ठं महात्मानमसक्तं तेजसां निधिम्।
अष्टादशभुजं स्थाणुं सर्वाभरणभूषितम्॥ २५०॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात मैंने देखा कि भगवान महेश्वर स्थिरचित्त होकर खड़े हैं। उनके गले में एक नीला चिह्न सुशोभित था। वे महात्मा किसी भी वस्तु में आसक्त नहीं थे। वे तेज के भंडार प्रतीत हो रहे थे। उनकी अठारह भुजाएँ थीं। वे भगवान स्थाणु समस्त आभूषणों से सुशोभित थे।
 
After that I saw that Lord Maheshwara was standing with a steady mind. A blue mark was adorning his neck. That great soul was not attached to anything. He appeared to be a treasure of brilliance. He had eighteen arms. That Lord Sthānu was adorned with all the ornaments.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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