श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 239-240
 
 
श्लोक  13.15.239-240 
अथापश्यं क्षणेनैव तमेवैरावतं पुन:।
हंसकुन्देन्दुसदृशं मृणालरजतप्रभम्॥ २३९॥
वृषरूपधरं साक्षात् क्षीरोदमिव सागरम्।
कृष्णपुच्छं महाकायं मधुपिङ्गललोचनम्॥ २४०॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् क्षण भर में मैंने देखा कि उसी ऐरावत हाथी ने बैल का रूप धारण कर लिया है। उसका रंग हंस, कुण्ड और चन्द्रमा के समान श्वेत था। उसका शरीर कमल के समान उज्ज्वल और चाँदी के समान चमक रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो क्षीर सागर ने स्वयं बैल का रूप धारण कर लिया हो। उसकी काली पूँछ, विशाल शरीर और मधु-लाल नेत्र अत्यंत सुन्दर लग रहे थे।
 
Thereafter in a moment I saw that the same elephant Airavat had assumed the form of a bull. His colour was white like that of a swan, a Kunda and the moon. His body was bright like a lotus and shining like silver. It seemed as if the Ksheer Sagar itself had assumed the form of a bull. His black tail, huge body and eyes of honey-red colour were looking beautiful.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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