श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 238
 
 
श्लोक  13.15.238 
एवमुक्त्वा तु देवेन्द्रं दु:खादाकुलितेन्द्रिय:।
न प्रसीदति मे देव: किमेतदिति चिन्तयन्॥ २३८॥
 
 
अनुवाद
इन्द्रदेव से ऐसा कहकर मेरी इन्द्रियाँ दुःख से व्यथित हो गईं और मैं सोचने लगा कि क्या कारण है कि भगवान महादेव मुझ पर प्रसन्न नहीं हैं॥238॥
 
Having said this to Lord Indra, my senses became distressed with sorrow and I started wondering what is the reason that Lord Mahadev is not pleased with me.॥ 238॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas