श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 236
 
 
श्लोक  13.15.236 
तस्माद् वरमहं काङ्क्षे निधनं वापि कौशिक।
गच्छ वा तिष्ठ वा शक्र यथेष्टं बलसूदन॥ २३६॥
 
 
अनुवाद
अतः हे कौशिक! मैं भगवान शंकर से वर या मृत्यु की इच्छा रखता हूँ। बलसूदन इन्द्र! तुम जाओ या रहो, जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो॥ 236॥
 
Therefore, Kaushik! I desire to get a boon or death from Lord Shankar. Balasudan Indra! You go or stay, do as you wish.॥ 236॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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