श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 228
 
 
श्लोक  13.15.228 
मात्रा पूर्वं ममाख्यातं कारणं लोकलक्षणम्।
नास्ति चेशात् परं शक्र तं प्रपद्य यदीच्छसि॥ २२८॥
 
 
अनुवाद
हे इन्द्र! मेरी माता ने पहले ही कहा था कि जगत में महादेवजी के अतिरिक्त अथवा उनसे बढ़कर कोई भी कार्य का कारण नहीं है; अतः यदि तू किसी भी अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति की इच्छा रखता हो, तो भगवान शंकर की ही शरण में जा।
 
Indra! My mother had said earlier that there is no cause for action in the world other than Mahadevji or greater than him; therefore, if you desire to obtain any desired object, seek refuge in Lord Shankar only. 228.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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