श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 225-226
 
 
श्लोक  13.15.225-226 
विश्वेशं कारणगुरुं लोकालोकान्तकारणम्।
भूताभूतभविष्यच्च जनकं सर्वकारणम्॥ २२५॥
अक्षरक्षरमव्यक्तं विद्याविद्ये कृताकृते।
धर्माधर्मौ यत: शक्र तमहं कारणं ब्रुवे॥ २२६॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र! जो सम्पूर्ण जगत् के अधिपति हैं, प्रकृति के नियन्ता हैं, जो जगत् की उत्पत्ति और सम्पूर्ण लोकों के संहार के भी कारण हैं, जो भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों के स्वरूप हैं, जो अक्षर-अक्षर, अव्यक्त, ज्ञान-अज्ञान, क्रिया-कर्म सबके उत्पादक और कारण हैं तथा जिनसे धर्म और अधर्म प्रकट हुए हैं, उन महादेवजी को मैं सबका परम कारण कहता हूँ॥225-226॥
 
Indra! Who is the Supreme Lord of the entire universe, the controller of nature, who is the cause of the creation of the world and also the destruction of all the worlds, who is the form of all the three times - past, present and future, who is the producer and cause of all, the letter-letter, the unmanifested, the knowledge-ignorance, the action-action and from whom religion and unrighteousness have manifested, I call that Mahadevji as the ultimate cause of all. 225-226॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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