श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  13.15.22-23 
वासुदेव उवाच
न गति: कर्मणां शक्या वेत्तुमीशस्य तत्त्वत:।
हिरण्यगर्भप्रमुखा देवा: सेन्द्रा महर्षय:॥ २२॥
न विदुर्यस्य भवनमादित्या: सूक्ष्मदर्शिन:।
स कथं नरमात्रेण शक्यो ज्ञातुं सतां गति:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीकृष्ण बोले - भगवान शंकर के कर्मों की यथार्थ गति जानना असम्भव है। जो सत्पुरुषों द्वारा आश्रय प्राप्त हैं और जिनके निवासस्थान को ब्रह्मा, इन्द्र, महर्षि तथा चतुर आदित्य आदि देवता भी नहीं जानते, उन भगवान शिव के तत्त्व का ज्ञान मनुष्य मात्र को कैसे हो सकता है? 22-23॥
 
Lord Shri Krishna said – It is impossible to know the exact dynamics of Lord Shankar's actions. How can a mere human being have the knowledge of the essence of Lord Shiva, who is sheltered by good men and whose abode is unknown even to gods like Brahma, Indra, Maharshi and the astute Aditya? 22-23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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