श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 212-213h
 
 
श्लोक  13.15.212-213h 
यदि देवा: सुरा: शक्र पश्यन्त्यन्यां भवाद् गतिम्॥ २१२॥
किं न गच्छन्ति शरणं मर्दिताश्चासुरै: सुरा:।
 
 
अनुवाद
शंकर! यदि महान् देवतागण महादेवजी के अतिरिक्त अन्य कोई आश्रय नहीं देखते, तो जब वे दैत्यों द्वारा कुचले जाते हैं, तब वे महादेवजी की शरण क्यों नहीं लेते?॥212 1/2॥
 
Shankara! If the illustrious gods see no other support than Mahadeva, why do they not seek refuge in Him when they are crushed by the demons?॥ 212 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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