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mahabharat 13.15.196: हम उन भगवान शिव से वर प्राप्त करना चाहते हैं जो अज्ञानरूपी अंधकार से परे हैं और जो परम आध्यात्मिक प्रकाश के स्वरूप हैं, जो तपस्वियों के परम तपस्वरूप हैं और जिनके ज्ञान को प्राप्त करके बुद्धिमान पुरुष कभी शोक नहीं करते ॥196॥   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 196
 
 
श्लोक  13.15.196 
तमस: परमं ज्योतिस्तपस्तद्‍वृत्तिनां परम्।
यं ज्ञात्वा नानुशोचन्ति वरं तस्माद् वृणीमहे॥ १९६॥
 
 
अनुवाद
हम उन भगवान शिव से वर प्राप्त करना चाहते हैं जो अज्ञानरूपी अंधकार से परे हैं और जो परम आध्यात्मिक प्रकाश के स्वरूप हैं, जो तपस्वियों के परम तपस्वरूप हैं और जिनके ज्ञान को प्राप्त करके बुद्धिमान पुरुष कभी शोक नहीं करते ॥196॥
 
We wish to obtain boons from that very Lord Shiva who is beyond the darkness of ignorance and who is the embodiment of the supreme spiritual light, who is the ultimate penance of ascetics and after acquiring whose knowledge the wise men never lament. ॥196॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)