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mahabharat 13.15.194: जिनका न आदि है, न मध्य है और न अन्त है, जिनकी महिमा ही ज्ञान है और जो मन की विचारशक्ति से परे हैं और इन्हीं कारणों से जिन्हें परमात्मा कहा गया है, उन महादेवजी से हम आशीर्वाद प्राप्त करेंगे ॥194॥   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 194
 
 
श्लोक  13.15.194 
अनादिमध्यपर्यन्तं ज्ञानैश्वर्यमचिन्तितम्।
आत्मानं परमं यस्माद् वरं तस्माद् वृणीमहे॥ १९४॥
 
 
अनुवाद
जिनका न आदि है, न मध्य है और न अन्त है, जिनकी महिमा ही ज्ञान है और जो मन की विचारशक्ति से परे हैं और इन्हीं कारणों से जिन्हें परमात्मा कहा गया है, उन महादेवजी से हम आशीर्वाद प्राप्त करेंगे ॥194॥
 
We shall receive blessings from that Mahadeva who has no beginning, no middle and no end, whose only glory is knowledge and who is beyond the thinking power of the mind and for these very reasons who is called the Supreme Soul. ॥194॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)