श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 190
 
 
श्लोक  13.15.190 
दिवसकरशशाङ्कवह्निदीप्तं
त्रिभुवनसारमसारमाद्यमेकम्।
अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं
जगति पुमानिह को लभेत शान्तिम्॥ १९०॥
 
 
अनुवाद
जो सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि के समान नेत्रों से प्रकट होते हैं, जो त्रिभुवन के सार हैं, जिनका सार महान है, जिनसे बढ़कर कोई सार नहीं है, जो जगत के आदि कारण हैं, अद्वितीय और अविनाशी हैं, उन भगवान रुद्र को भक्तिपूर्वक प्रसन्न किए बिना इस संसार में कौन शांति प्राप्त कर सकता है ॥190॥
 
Who can attain peace in this world without pleasing Lord Rudra with devotion who is manifested by the radiance of the sun, moon and fire from his eyes, who is the essence of the Tribhuvan, whose essence is greater than whom there is no other essence, who is the original cause of the world, unique and immortal. 190॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas