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mahabharat 13.15.188: न तो मैं स्वर्ग चाहता हूँ, न देवताओं का राज्य चाहता हूँ । न मैं ब्रह्मलोक चाहता हूँ, न निर्गुण ब्रह्म का मिलन चाहता हूँ । मैं पृथ्वी की समस्त कामनाएँ नहीं चाहता । मैं तो केवल भगवान शिव की सेवा ही चाहता हूँ । 188॥   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 188
 
 
श्लोक  13.15.188 
न नाकपृष्ठं न च देवराज्यं
न ब्रह्मलोकं न च निष्कलत्वम्।
न सर्वकामानखिलान् वृणोमि
हरस्य दासत्वमहं वृणोमि॥ १८८॥
 
 
अनुवाद
न तो मैं स्वर्ग चाहता हूँ, न देवताओं का राज्य चाहता हूँ । न मैं ब्रह्मलोक चाहता हूँ, न निर्गुण ब्रह्म का मिलन चाहता हूँ । मैं पृथ्वी की समस्त कामनाएँ नहीं चाहता । मैं तो केवल भगवान शिव की सेवा ही चाहता हूँ । 188॥
 
Neither do I want heaven, nor do I desire to attain the kingdom of the gods. I neither wish for Brahmaloka nor do I want to attain the union of Nirguna Brahma. I do not wish to attain all the desires of the earth. I only choose to serve Lord Shiva. 188॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)