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श्लोक 13.15.186-187  |
अपि कीट: पतङ्गो वा भवेयं शङ्कराज्ञया।
न तु शक्र त्वया दत्तं त्रैलोक्यमपि कामये॥ १८६॥
श्वापि महेश्वरवचनाद्
भवामि स हि न: पर: काम:।
त्रिदशगणराज्यमपि खलु
नेच्छाम्यमहेश्वराज्ञप्तम्॥ १८७॥ |
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| अनुवाद |
| शंकर! भगवान शंकर की आज्ञा से मैं कीट या पतंगा तो बन सकता हूँ, किन्तु आपके द्वारा दिया हुआ तीनों लोकों का राज्य मैं नहीं लेना चाहता। यदि महेश्वर की आज्ञा से मैं कुत्ता भी बन जाऊँ, तो उसे मैं अपनी श्रेष्ठ कामना की पूर्ति मानूँगा; किन्तु महादेवजी के अतिरिक्त अन्य किसी से प्राप्त देवताओं का राज्य मैं नहीं लेना चाहता।' 186-187 |
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| ‘Shankar! I can become an insect or a moth by the order of Lord Shankar, but I do not want to take the kingdom of the three worlds given by you. If I become a dog by the order of Maheshwar, I will consider it the fulfillment of the best wish; but I do not wish to take the kingdom of the gods received from anyone else except Mahadevji. 186-187. |
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