श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 182
 
 
श्लोक  13.15.182 
वाय्वम्बुभुजोऽपि सतो
नरस्य दु:खक्षय: कुतस्तस्य।
भवति हि सुरासुरगुरौ
यस्य न विश्वेश्वरे भक्ति:॥ १८२॥
 
 
अनुवाद
चाहे कोई जल या वायु पर जीवित रहे, परन्तु देवताओं और दानवों के गुरु भगवान् विश्वनाथ में भक्ति न रखने पर उसके दुःखों का नाश कैसे हो सकता है ?॥182॥
 
Even if someone survives on water or air, how can his sorrows be destroyed if he does not have devotion towards Lord Vishwanath, the guru of gods and demons?॥ 182॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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