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श्लोक 13.15.182  |
वाय्वम्बुभुजोऽपि सतो
नरस्य दु:खक्षय: कुतस्तस्य।
भवति हि सुरासुरगुरौ
यस्य न विश्वेश्वरे भक्ति:॥ १८२॥ |
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| अनुवाद |
| चाहे कोई जल या वायु पर जीवित रहे, परन्तु देवताओं और दानवों के गुरु भगवान् विश्वनाथ में भक्ति न रखने पर उसके दुःखों का नाश कैसे हो सकता है ?॥182॥ |
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| Even if someone survives on water or air, how can his sorrows be destroyed if he does not have devotion towards Lord Vishwanath, the guru of gods and demons?॥ 182॥ |
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