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श्लोक 13.15.181  |
जन्म श्वपाकमध्येऽपि
मेऽस्तु हरचरणवन्दनरतस्य।
मा वानीश्वरभक्तो
भवानि भवनेऽपि शक्रस्य॥ १८१॥ |
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| अनुवाद |
| यदि मुझे भगवान शंकर के चरणों की पूजा में तत्पर रहने का अवसर मिले, तो चाण्डालों में भी जन्म लेने पर मैं उसे सहर्ष स्वीकार कर लूँगा। किन्तु भगवान शिव की अनन्य भक्ति से रहित होने के कारण मैं इन्द्र के घर में भी स्थान नहीं पाना चाहता। 181॥ |
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| If I get an opportunity to remain active in worshiping the feet of Lord Shankar, then I will gladly accept it if I am born among the Chandalas also. But being devoid of exclusive devotion to Lord Shiva, I do not want to find a place even in Indra's house. 181॥ |
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