श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 180
 
 
श्लोक  13.15.180 
पशुपतिवचनाद् भवामि सद्य:
कृमिरथवा तरुरप्यनेकशाख:।
अपशुपतिवरप्रसादजा मे
त्रिभुवनराज्यविभूतिरप्यनिष्टा॥ १८०॥
 
 
अनुवाद
भगवान पशुपति की आज्ञा से मैं सहज ही कीड़ा या अनेक शाखाओं वाला वृक्ष बन सकता हूँ; किन्तु यदि भगवान शिव के अतिरिक्त किसी अन्य के आशीर्वाद से मुझे तीनों लोकों का राजसी वैभव प्राप्त हो जाए, तो भी वह वांछनीय नहीं है॥180॥
 
‘I can readily become an insect or a tree with many branches at the command of Lord Pashupati; but if I am able to obtain the royal glory of the three worlds by the benediction of someone other than Lord Shiva, even that is not desirable.॥ 180॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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