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mahabharat 13.15.179: इन्द्र! मैं जो कह रहा हूँ वह सत्य है, सच है और निश्चित है। महादेवजी के अतिरिक्त मुझे कुछ भी प्रिय नहीं है। 179।   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 179
 
 
श्लोक  13.15.179 
सत्यं सत्यं हि न: शक्र वाक्यमेतत् सुनिश्चितम्।
न यन्महेश्वरं मुक्त्वा कथान्या मम रोचते॥ १७९॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र! मैं जो कह रहा हूँ वह सत्य है, सच है और निश्चित है। महादेवजी के अतिरिक्त मुझे कुछ भी प्रिय नहीं है। 179।
 
Indra! What I am saying is true, true and certain. I do not like anything except Mahadevji. 179.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)