श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 170
 
 
श्लोक  13.15.170 
शतानि सप्त चैवाहं वायुभक्षस्तदाभवम्।
एकं वर्षसहस्रं तु दिव्यमाराधितो मया॥ १७०॥
 
 
अनुवाद
फिर शेष सात सौ वर्षों तक मैं केवल वायु पीकर जीवित रहा। इस प्रकार एक हजार दिव्य वर्षों तक मैंने उनकी आराधना की॥170॥
 
Then for the remaining seven hundred years I survived by drinking only air. In this way I worshipped Him for a thousand divine years.॥ 170॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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