श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 162
 
 
श्लोक  13.15.162 
गौर: श्यामस्तथा कृष्ण: पाण्डुरो धूमलोहित:।
विकृताक्षो विशालाक्षो दिग्वासा: सर्ववासक:॥ १६२॥
 
 
अनुवाद
वे कभी गोरे, कभी श्याम, कभी काले, कभी श्वेत, कभी धुएँ के रंग के या लाल दिखाई देते हैं। कभी उनके नेत्र विकृत होते हैं। कभी वे सुन्दर विशाल नेत्रों से सुशोभित होते हैं। कभी वे नग्न दिखाई देते हैं और कभी वे सब प्रकार के वस्त्रों से विभूषित होते हैं॥162॥
 
Sometimes they appear fair, sometimes dark, sometimes black, sometimes white, sometimes smoke-coloured or red. Sometimes they have distorted eyes. Sometimes they are adorned with beautiful large eyes. Sometimes they appear naked and sometimes they are adorned with all kinds of clothes.॥ 162॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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