श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 161
 
 
श्लोक  13.15.161 
क्रीडते ऋषिकन्याभिर्ऋषिपत्नीभिरेव च।
ऊर्ध्वकेशो महाशेफो नग्नो विकृतलोचन:॥ १६१॥
 
 
अनुवाद
वह ऋषियों की कन्याओं और मुनियों की पत्नियों के साथ क्रीड़ा करता है। कभी उसके बाल बढ़े हुए होते हैं, कभी उसका लिंग बड़ा होता है, कभी वह नंगा होता है और कभी उसकी आँखें भयंकर होती हैं ॥161॥
 
He plays with the daughters of sages and the wives of saints. Sometimes he has raised hair, sometimes he has a big penis, sometimes he is naked and sometimes he has fierce eyes. ॥161॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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