श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  13.15.157 
वल्गते जृम्भते चैव रुदते रोदयत्यपि।
उन्मत्तमत्तरूपं च भाषते चापि सुस्वर:॥ १५७॥
 
 
अनुवाद
भगवान रुद्र उछलते-कूदते हैं, नाचते हैं, जम्हाई लेते हैं, रोते हैं और दूसरों को रुलाते हैं, कभी पागल या शराबी की तरह बोलते हैं, और कभी मधुर वाणी में अच्छे वचन बोलते हैं॥157॥
 
Lord Rudra jumps and dances. He yawns. He cries and makes others cry. Sometimes he talks like a madman or a drunkard and sometimes he speaks good words in a sweet voice.॥ 157॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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