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श्लोक 13.15.152  |
सर्वलोकान्तरात्मा च सर्वग: सर्ववाद्यपि।
सर्वत्र भगवान् ज्ञेयो हृदिस्थ: सर्वदेहिनाम्॥ १५२॥ |
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| अनुवाद |
| वे सम्पूर्ण जगत् के अन्तर्यामी, सर्वव्यापी और सर्वव्यापक हैं, उन भगवान शिव को सर्वत्र और समस्त प्राणियों के हृदय में विद्यमान जानना चाहिए ॥152॥ |
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| He is the inner soul of the entire world, omnipresent and universal, that Lord Shiva should be known to be present everywhere and in the hearts of all living beings. 152॥ |
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