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श्लोक 13.15.151  |
अनेकरावसंघुष्टश्चानेकस्तुतिसंस्कृत:।
सर्वभूतान्तक: सर्व: सर्वलोकप्रतिष्ठित:॥ १५१॥ |
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| अनुवाद |
| उसके निकट अनेक प्रकार के वचन कहे जाते रहते हैं। वह अनेक प्रकार की स्तुतियों से सम्मानित है, वह समस्त प्राणियों का संहार करता है, वह स्वयं ही सबका रूप है और सबका अंतर्यामी होकर समस्त लोकों में स्थित है॥151॥ |
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| Many kinds of words keep being proclaimed near him. He is honoured with many kinds of praises, he kills all living beings, he himself is the form of everything and is established in all the worlds as the inner soul of all.॥ 151॥ |
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