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श्लोक 13.15.136  |
को हि तत्त्वेन तद् वेद ईशस्य चरितं शुभम्।
कृतवान् यानि रूपाणि देवदेव: पुरा किल।
क्रीडते च तथा शर्व: प्रसीदति यथा च वै॥ १३६॥ |
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| अनुवाद |
| पूर्वकाल में अनेक रूप धारण करने वाले भगवान् के शुभ चरित्र को कौन जानता है ? वे किस प्रकार लीला करते हैं और किस प्रकार प्रसन्न होते हैं ? इसे कौन समझ सकता है ॥ 136॥ |
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| Who truly knows the auspicious character of the God who has assumed various forms in the past? How does he play and how does he become happy? Who can understand this?॥ 136॥ |
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