श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  13.15.135 
यस्य रूपाण्यनेकानि प्रवदन्ति मनीषिण:।
स्थानानि च विचित्राणि प्रसादाश्चाप्यनेकश:॥ १३५॥
 
 
अनुवाद
ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि भगवान शंकर के अनेक रूप हैं। वे अनेक स्थानों में निवास करते हैं और उनकी कृपा भी अनेक रूपों में प्रकट होती है॥135॥
 
Wise men say that Lord Shankar has many forms. He resides in many different places and his grace also appears in many forms.॥ 135॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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