श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 134
 
 
श्लोक  13.15.134 
अम्बोवाच
दुर्विज्ञेयो महादेवो दुराधारो दुरन्तक:।
दुराबाधश्च दुर्ग्राह्यो दुर्दृश्यो ह्यकृतात्मभि:॥ १३४॥
 
 
अनुवाद
माता बोलीं- जिन्होंने अपने मन को वश में नहीं किया है, उनके लिए महादेवजी का ज्ञान प्राप्त करना बड़ा कठिन है। उन्हें मन में धारण करना कठिन है। उनकी प्राप्ति के मार्ग में अनेक बाधाएँ हैं। कठिन बाधाएँ हैं। उन्हें ग्रहण करना और उनका दर्शन करना बड़ा कठिन है॥134॥
 
Mother said- It is very difficult for those who have not controlled their mind to have the knowledge of Mahadevji. It is difficult to imbibe him in the mind. There are many obstacles in the way of attaining him. There are difficult obstacles. It is very difficult to accept and see him.॥ 134॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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