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mahabharat 13.15.132-133: हे सच्चिदानन्दस्वरूप गोविन्द! श्रेष्ठ मधुसूदन! मेरे ऐसा पूछने पर मेरी पुत्रवधू के नेत्रों में आँसू भर आए। मेरा सिर सूँघकर वह मेरे शरीर के समस्त अंगों को सहलाने लगी और विनीत भाव से बोली॥132-133॥   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 132-133
 
 
श्लोक  13.15.132-133 
एवमुक्ता तदा कृष्ण माता मे सुतवत्सला।
मूर्धन्याघ्राय गोविन्द सबाष्पाकुललोचना॥ १३२॥
प्रमार्जन्ती च गात्राणि मम वै मधुसूदन।
दैन्यमालम्ब्य जननी इदमाह सुरोत्तम॥ १३३॥
 
 
अनुवाद
हे सच्चिदानन्दस्वरूप गोविन्द! श्रेष्ठ मधुसूदन! मेरे ऐसा पूछने पर मेरी पुत्रवधू के नेत्रों में आँसू भर आए। मेरा सिर सूँघकर वह मेरे शरीर के समस्त अंगों को सहलाने लगी और विनीत भाव से बोली॥132-133॥
 
Govind in the form of Sachchidananda! Best Madhusudan! When I asked this, my daughter-in-law's eyes filled with tears. After smelling my head, she started caressing all my body parts and said in a humble manner. 132-133॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)