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श्लोक 13.15.132-133  |
एवमुक्ता तदा कृष्ण माता मे सुतवत्सला।
मूर्धन्याघ्राय गोविन्द सबाष्पाकुललोचना॥ १३२॥
प्रमार्जन्ती च गात्राणि मम वै मधुसूदन।
दैन्यमालम्ब्य जननी इदमाह सुरोत्तम॥ १३३॥ |
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| अनुवाद |
| हे सच्चिदानन्दस्वरूप गोविन्द! श्रेष्ठ मधुसूदन! मेरे ऐसा पूछने पर मेरी पुत्रवधू के नेत्रों में आँसू भर आए। मेरा सिर सूँघकर वह मेरे शरीर के समस्त अंगों को सहलाने लगी और विनीत भाव से बोली॥132-133॥ |
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| Govind in the form of Sachchidananda! Best Madhusudan! When I asked this, my daughter-in-law's eyes filled with tears. After smelling my head, she started caressing all my body parts and said in a humble manner. 132-133॥ |
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