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श्लोक 13.15.129  |
जनन्यास्तद् वच: श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन्।
प्राञ्जलि: प्रणतो भूत्वा इदमम्बामचोदयम्॥ १२९॥ |
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| अनुवाद |
| शत्रुसूदन! अपनी माता के ये वचन सुनकर मैंने तुरन्त ही उनके चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनसे यह पूछा-॥129॥ |
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| Shatrusudan! On hearing these words of my mother, I immediately bowed down to her feet and with folded hands asked her this -॥ 129॥ |
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