श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 129
 
 
श्लोक  13.15.129 
जनन्यास्तद् वच: श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन्।
प्राञ्जलि: प्रणतो भूत्वा इदमम्बामचोदयम्॥ १२९॥
 
 
अनुवाद
शत्रुसूदन! अपनी माता के ये वचन सुनकर मैंने तुरन्त ही उनके चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनसे यह पूछा-॥129॥
 
Shatrusudan! On hearing these words of my mother, I immediately bowed down to her feet and with folded hands asked her this -॥ 129॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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