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श्लोक 13.15.128  |
तं प्रपद्य सदा वत्स सर्वभावेन शङ्करम्।
तत्प्रसादाच्च कामेभ्य: फलं प्राप्स्यसि पुत्रक॥ १२८॥ |
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| अनुवाद |
| "बेटा! उन्हीं भगवान शंकर की सदैव पूर्ण मन से शरणागति करके, उनकी कृपा से ही तुम मनोवांछित फल प्राप्त कर सकोगे।" ॥128॥ |
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| "Son! By always surrendering to the same Lord Shankar with all your heart, you will be able to achieve the desired results only by his grace." ॥128॥ |
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