श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  13.15.127 
अप्रसाद्य विरूपाक्षं वरदं स्थाणुमव्ययम्।
कुत: क्षीरोदनं वत्स सुखानि वसनानि च॥ १२७॥
 
 
अनुवाद
हे बालक! जो सबको वर देने वाले, नित्य स्थिर और अमर हैं, उन भगवान विरुपाक्ष को प्रसन्न किए बिना दूध, चावल और आरामदायक वस्त्र कैसे प्राप्त हो सकते हैं? 127॥
 
Child! How can one get milk, rice and comfortable clothes without pleasing Lord Virupaksha, who is the giver of boons to all, who is eternally stable and who is immortal? 127॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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