श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 117-118
 
 
श्लोक  13.15.117-118 
अथ गव्यं पयस्तात कदाचित् प्राशितं मया॥ ११७॥
पित्राहं यज्ञकाले हि नीतो ज्ञातिकुलं महत्।
तत्र सा क्षरते देवी दिव्या गौ: सुरनन्दिनी॥ ११८॥
 
 
अनुवाद
पिताजी! उससे एक दिन पहले मैंने गाय का दूध पिया था। पिताजी मुझे यज्ञ के दौरान एक बहुत धनी परिवार के घर ले गए थे। वहाँ दिव्य सुरभि गाय दूध दे रही थी। 117-118
 
Father! One day before that I had drunk cow's milk. Father had taken me to the house of a very wealthy family during the yagya. There the divine Surbhi cow was giving milk. 117-118.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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