श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 112-113
 
 
श्लोक  13.15.112-113 
तस्याहमभवं पुत्रो धौम्यश्चापि ममानुज:॥ ११२॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य धौम्येन सह माधव।
आगच्छमाश्रमं क्रीडन् मुनीनां भावितात्मनाम्॥ ११३॥
 
 
अनुवाद
मैं उनका पुत्र हूँ। मेरे छोटे भाई का नाम धौम्य है। माधव! एक बार मैं धौम्य के साथ क्रीड़ा करता हुआ शुद्ध ऋषियों के आश्रम में पहुँचा। 112-113।
 
I am his son. My younger brother's name is Dhoumya. Madhava! Once while playing with Dhoumya, I came to the ashram of pure sages. 112-113.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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