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mahabharat 13.15.106-108h: देवर्षि नारद ने भी पहले भगवान शंकर की भक्तिपूर्वक आराधना की थी। इससे प्रसन्न होकर गुरु रूपी देवगुरु महादेवजी ने उन्हें वरदान दिया कि 'तेज, तप और यश में कोई भी तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकेगा। तुम गान और वीणा बजाते हुए सदैव मेरा अनुसरण करोगे।' 106-107 1/2   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 106-108h
 
 
श्लोक  13.15.106-108h 
नारदेन तु भक्त्यासौ भव आराधित: पुरा॥ १०६॥
तस्य तुष्टो महादेवो जगौ देवगुरुर्गुरु:।
तेजसा तपसा कीर्त्या त्वत्समो न भविष्यति॥ १०७॥
गीतेन वादितव्येन नित्यं मामनुयास्यसि।
 
 
अनुवाद
देवर्षि नारद ने भी पहले भगवान शंकर की भक्तिपूर्वक आराधना की थी। इससे प्रसन्न होकर गुरु रूपी देवगुरु महादेवजी ने उन्हें वरदान दिया कि 'तेज, तप और यश में कोई भी तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकेगा। तुम गान और वीणा बजाते हुए सदैव मेरा अनुसरण करोगे।' 106-107 1/2
 
Devarshi Narad had also worshipped Lord Shankar with devotion earlier. Being pleased with this, Devguru Mahadevji, who is the Guru, gave him the boon that 'No one will be equal to you in brilliance, penance and fame. You will always follow me through songs and playing the Veena'. 106-107 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)