श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 105-106h
 
 
श्लोक  13.15.105-106h 
शक्रेण तु पुरा देवो वाराणस्यां जनार्दन।
आराधितोऽभूद् भक्तेन दिग्वासा भस्मगुण्ठित:॥ १०५॥
आराध्य स महादेवं देवराजमवाप्तवान्।
 
 
अनुवाद
जनार्दन! बहुत समय पहले की बात है, जब इंद्र ने काशीपुरी में भस्म से सुसज्जित दिगम्बर महादेवजी की बड़ी भक्तिपूर्वक पूजा की थी। महादेवजी की पूजा करके ही उन्हें देवराज का पद प्राप्त हुआ था॥105 1/2॥
 
Janardan! It was a long time ago that Indra worshipped the ash-adorned Digambara Mahadevji in Kashipuri with great devotion. It was by worshipping Mahadevji that he achieved the position of Devraj.॥105 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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