श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 149: बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  13.149.55 
पापेन कर्मणा देवि बद्धो हिंसारतिर्नर:।
अप्रिय: सर्वभूतानां हीनायुरुपजायते॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
हे देवि! पापकर्मों से बंधा हुआ और हिंसा में प्रवृत्त हुआ मनुष्य समस्त प्राणियों को प्रिय नहीं होता और इसलिए उसकी आयु अल्प होती है ॥ 55॥
 
Devi! A man bound by sinful deeds and prone to violence, becomes unpopular to all creatures and hence has a short life. ॥ 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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