श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 149: बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  13.149.54 
य: कश्चिन्निरयात् तस्मात् समुत्तरति कर्हिचित्।
मानुष्यं लभते चापि हीनायुस्तत्र जायते॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
यदि किसी को उस नरक से कभी मुक्ति मिल भी जाए तो वह मनुष्य योनि में जन्म तो लेता है, परन्तु वहाँ उसकी आयु बहुत ही अल्प होती है ॥54॥
 
If someone ever gets freedom from that hell, then he is born as a human being, but his lifespan there is very short. ॥ 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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