श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 149: बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  13.149.48 
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि देवि कर्मफलोदयम्।
मर्त्यलोके नर: सर्वो येन स्वफलमश्नुते॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले - देवि ! अब मैं तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक बताता हूँ कि कर्मों का फल किस प्रकार उत्पन्न होता है और मृत्युलोक में सभी मनुष्य किस प्रकार अपने कर्मों का फल भोगते हैं ॥ 48॥
 
Sri Maheshwar said - Devi! Now I am happily telling you how the results of karma arise and how all the humans in the mortal world enjoy the results of their actions. ॥ 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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